
पेंशन (Pension) विवाद एक बार फिर केंद्र सरकार के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इस मामले को हल करने की कोशिशें पिछले डेढ़ दशक से जारी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। सरकार ने हाल ही में वित्त अधिनियम 2025 (Finance Act 2025) के जरिये इस संकट से निकलने की एक नई रणनीति अपनाई है, लेकिन न्यायालय के पुराने आदेश इस राह में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े हैं।
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अब जब सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर चुका है, और पेंशनभोगियों को भुगतान नहीं किया गया है, तो 16 मई 2025 को होने वाली सुनवाई सरकार के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। अगर अदालत ने फिर से FORIPSO के पक्ष में फैसला दिया, तो सरकार के पास उसे लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
2006 से पहले और बाद में रिटायर अधिकारियों की पेंशन में विसंगति
यह पूरा विवाद उन अधिकारियों से जुड़ा है जो 2006 से पहले रिटायर हुए बनाम 2006 के बाद रिटायर हुए। समान रैंक होने के बावजूद, दोनों समूहों को मिलने वाली पेंशन में बड़ा अंतर पाया गया। 6वें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 2008 में जारी सरकारी आदेश (Office Memorandum – OM) के कारण 2006 से पहले रिटायर हुए पेंशनभोगियों को काफी कम पेंशन मिलने लगी।
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इस विसंगति के खिलाफ ऑल इंडिया S-30 पेंशनर्स एसोसिएशन और FORIPSO (Forum of Retired IPS Officers) ने लंबी कानूनी लड़ाई शुरू की थी। FORIPSO के मुताबिक, 2006 से पहले रिटायर हुए डीजी रैंक के आईपीएस अधिकारियों के साथ भेदभाव किया गया, जिन्हें सेवा के दौरान उच्च वेतनमान मिलने के बावजूद न्यूनतम पेंशन पर सीमित कर दिया गया।
कोर्ट से मिला राहत का आदेश, लेकिन नहीं हुआ क्रियान्वयन
इस मामले की शुरुआत CAT (Central Administrative Tribunal) से हुई, जिसने 2015 में पेंशन संशोधन के पक्ष में आदेश दिया। जब केंद्र सरकार ने आदेश का पालन नहीं किया, तो 2024 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी FORIPSO के पक्ष में फैसला सुनाया और सरकार को आदेश दिया कि 01.01.2006 से संशोधित पेंशन और बकाया भुगतान तीन माह के भीतर किया जाए।
इसके बाद भी आदेश का पालन नहीं होने पर FORIPSO ने अवमानना याचिका दायर की। केंद्र सरकार ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की, जिसे 4 अक्टूबर 2024 को खारिज कर दिया गया। अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 मई 2025 को होनी है।
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वित्त अधिनियम 2025: केंद्र की नई रणनीति
केंद्र सरकार ने Finance Act 2025 के जरिये पेंशन विवाद से बचने का नया प्रयास किया है। इसमें कहा गया है कि सरकार को अपने पेंशनभोगियों को वर्गीकृत करने का अधिकार है और पेंशन की गणना के लिए सेवानिवृत्ति की तारीख को आधार बनाया जा सकता है। इस बदलाव से सरकार को अदालत के फैसलों को निष्प्रभावी करने में मदद मिल सकती है।
कोर्ट का विरोध और कानूनी अड़चनें
सरकार की यह कोशिश 1983 के डीएस नकरा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और 2008 के SPS Vains बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के सुप्रीम कोर्ट फैसलों के खिलाफ मानी जा रही है। इन फैसलों में स्पष्ट कहा गया है कि “सेवानिवृत्ति की तारीख पेंशन में भेदभाव का आधार नहीं बन सकती” और एक ही रैंक के अधिकारियों को समान पेंशन मिलनी चाहिए, चाहे वे किसी भी तारीख को सेवानिवृत्त हुए हों।
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वित्तीय बोझ से घबराई सरकार
इस मामले को सुलझाने में सरकार की सबसे बड़ी चिंता इसका आर्थिक भार है। FORIPSO के मुताबिक, यदि अदालत का आदेश पूरी तरह लागू किया गया, तो प्रत्येक प्रभावित अधिकारी को 14.5 लाख रुपये से 16.5 लाख रुपये तक का एरियर देना होगा। लगभग 300 से अधिक अधिकारियों के इससे प्रभावित होने की आशंका है। इस आधार पर कुल वित्तीय बोझ 25,000 करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है।