
केरल के एर्नाकुलम जिले के मुनंबम गांव में चल रहा जमीन विवाद अब राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। विवाद की जड़ में है वक्फ बोर्ड द्वारा 2019 में दी गई एक घोषणा, जिसमें उसने मुनंबम क्षेत्र की एक बड़ी जमीन को अपने स्वामित्व में बताया। इसके बाद राजस्व विभाग को यह निर्देश दिए गए कि वे मौजूदा ज़मीन मालिकों से भूमि कर (Land Tax) स्वीकार न करें। इससे लगभग 600 परिवारों के सामने बेदखली का संकट खड़ा हो गया।
इस मुद्दे ने तब और तूल पकड़ा जब हाल ही में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री श्रीमंत बालासाहेब पाटिल ने लोकसभा में वक्फ अधिनियम (Waqf Act) को संशोधित करने की आवश्यकता जताई। इसके बाद भाजपा (BJP) ने मुनंबम मामले को आधार बनाकर इसे एक व्यापक राजनीतिक अभियान में बदल दिया।
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मुनंबम जमीन विवाद केवल एक संपत्ति विवाद नहीं रह गया है, यह अब सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। जहां एक ओर स्थानीय लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा इसे अपने राजनीतिक अभियान का अहम हिस्सा बना रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस विवाद से देशभर में वक्फ संपत्तियों की समीक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है या यह एक और राजनीतिक मुद्दा बनकर रह जाता है।
वक्फ बोर्ड की भूमिका और जमीन का स्वामित्व विवाद
मुनंबम में विवादित भूमि की कुल मिल्कियत लगभग 35 एकड़ है, जिस पर कई पीढ़ियों से 600 परिवार रह रहे हैं। इनमें मछुआरे, किसान और स्थानीय निवासी शामिल हैं। लेकिन 2019 में केरल वक्फ बोर्ड (Kerala Waqf Board) ने इस भूमि को “वक्फ संपत्ति” घोषित कर दिया। इसके आधार पर उन्होंने राजस्व विभाग को निर्देशित किया कि वे भूमि कर स्वीकार न करें, जिससे मौजूदा मालिकों की कानूनी स्थिति को चुनौती मिल गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह जमीन कभी किसी वक्फ संपत्ति का हिस्सा नहीं रही और न ही इसके बारे में कोई ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। वहीं, वक्फ बोर्ड का दावा है कि उनके पास 1960 के दशक से संबंधित रिकॉर्ड हैं, जो इस भूमि को एक धार्मिक संस्था की संपत्ति घोषित करते हैं।
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भाजपा का रुख और राजनीतिक रणनीति
मुनंबम जमीन विवाद को भाजपा ने एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभारा है। पार्टी इसे “हिंदुओं की जमीन पर अतिक्रमण” और “धार्मिक तुष्टीकरण” का मामला बता रही है। केरल भाजपा अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने इस मुद्दे को लेकर कई बार सरकार पर निशाना साधा और इसे एक “राजनीतिक हथियार” के तौर पर इस्तेमाल किया।
हाल ही में आयोजित जनसभा में भाजपा नेताओं ने इस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की घोषणा की और इसे “वक्फ एक्ट में सुधार” के साथ जोड़ दिया। इसके साथ ही भाजपा ने यह भी मांग की कि वक्फ बोर्ड के पास भूमि अधिकारों की समीक्षा हो और उन संपत्तियों की जांच की जाए जिन्हें हाल के वर्षों में अपने अधीन बताया गया है।
स्थानीय निवासियों का विरोध और आंदोलन
मुनंबम गांव के लोग इस फैसले के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रहे हैं। ग्रामीणों ने मार्च 2024 में एक बड़ी रैली निकाली थी जिसमें महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने भी भाग लिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे वर्षों से इस जमीन पर रह रहे हैं, उन्होंने बिजली, पानी, सड़क आदि की सुविधाएं खुद के खर्च पर विकसित की हैं और अब अचानक उन्हें अवैध बताया जा रहा है।
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ग्रामीणों की मांग है कि सरकार इस विवाद की निष्पक्ष जांच कराए और वक्फ बोर्ड के दावे की कानूनी वैधता को चुनौती दे। कई लोगों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया है और अब यह मामला केरल हाईकोर्ट में लंबित है।
वक्फ अधिनियम में संभावित बदलाव और केंद्र सरकार की योजना
इस विवाद के बाद केंद्र सरकार की ओर से संकेत मिले हैं कि वह वक्फ अधिनियम 1995 में संशोधन पर विचार कर रही है। संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वक्फ बोर्ड अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करे और किसी भी संपत्ति को “वक्फ संपत्ति” घोषित करने से पहले उचित प्रक्रिया और पारदर्शिता अपनाई जाए।
इस प्रक्रिया में केंद्रीय गृह मंत्रालय और अल्पसंख्यक मंत्रालय शामिल हैं। यदि यह संशोधन आता है तो इसका असर देश भर में उन संपत्तियों पर पड़ सकता है जिन्हें वक्फ संपत्ति घोषित किया गया है लेकिन जहां आम नागरिक वर्षों से रह रहे हैं।
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राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
वामपंथी दल और कांग्रेस इस मुद्दे पर भाजपा को “ध्रुवीकरण” की राजनीति का दोषी ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा इस मामले को सांप्रदायिक रंग देकर आगामी चुनावों में लाभ लेना चाहती है। वहीं, भाजपा का कहना है कि यह मुद्दा केवल न्याय और पारदर्शिता का है, न कि धर्म का।