
अफगान तालिबान (Afghan Taliban) के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने मंगलवार को कंधार में एक बैठक में बड़ा दावा किया कि अमेरिका (USA) ने तालिबान के साथ अपने संबंधों को फिर से बहाल कर लिया है। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है, खासकर तब जब अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख और तालिबान के आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी पर से 85 करोड़ रुपये का इनाम हटा दिया है। यह कदम अमेरिकी डेलिगेशन की हाल ही में हुई काबुल यात्रा के बाद लिया गया है।
तालिबान और अमेरिका के बीच बदलते रिश्ते कई स्तरों पर संकेत दे रहे हैं। एक ओर अमेरिका की कूटनीति आर्थिक और रणनीतिक हितों को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं तालिबान इसे अपनी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के रूप में प्रचारित कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि मिनरल्स, बंधकों और मानवाधिकारों के बीच अमेरिका किस पक्ष का चयन करता है।
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अमेरिकी यात्रा और प्रतिबंधों में नरमी: तालिबान की ‘कूटनीतिक सफलता’
तालिबान ने इस घटनाक्रम को अपनी कूटनीतिक नीति की सफलता बताया है। उनका कहना है कि अमेरिका का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि तालिबान को अब एक गंभीर राजनीतिक शक्ति के रूप में मान्यता मिलने लगी है। इस बदलाव के पीछे अमेरिका की काबुल यात्रा और तालिबान नेताओं पर लगे प्रतिबंधों में ढील देना, यह संकेत देता है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ ठोस वार्ताएं हो रही हैं।
क्या अमेरिका को मिनरल्स डील (Minerals Deal) की जल्दी है?
एक अहम सवाल यह है कि क्या अमेरिका अफगानिस्तान में मौजूद बहुमूल्य खनिजों (Minerals) के लिए तालिबान के साथ फिर से डील करना चाहता है? वर्ष 2017 में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की मिनरल डील की थी, जिसे तालिबान ने 2021 में सत्ता में आने के बाद रद्द कर दिया था। अब जब फिर से संबंध सामान्य करने की कोशिशें हो रही हैं, तो यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिका शायद मिनरल्स को लेकर नई साझेदारी चाहता है।
अफगानिस्तान में लिथियम, कोबाल्ट, और अन्य दुर्लभ खनिजों का बड़ा भंडार है, जिनकी वैश्विक बाजार में Renewable Energy सेक्टर के लिए भारी मांग है। ऐसे में अमेरिका की दिलचस्पी इन संसाधनों में होना स्वाभाविक है।
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बंधकों की रिहाई भी अमेरिका की प्राथमिकता?
तालिबान ने हाल ही में दावा किया कि उन्होंने अमेरिका को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे अब पुराने तालिबान नहीं हैं। उन्होंने ट्रंप के कार्यकाल में दिए गए हथियारों को लौटाने से इनकार कर दिया था और अमेरिकी कैदियों की रिहाई को भी टाल दिया था। जानकारों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप, जो फिर से राष्ट्रपति पद की दौड़ में हैं, तालिबान से सौदेबाजी कर बंधकों की रिहाई की कोशिश कर सकते हैं। इससे उनकी छवि अमेरिका में मजबूत हो सकती है।
मानवाधिकारों पर सवाल, लेकिन अमेरिका की चुप्पी क्यों?
तालिबान शासन के दौरान महिलाओं और अल्पसंख्यकों के मानवाधिकार (Human Rights) के उल्लंघन के आरोप लगातार लगते रहे हैं। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने शुरुआत में तालिबान सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया था जब तक वह महिलाओं के अधिकारों को लागू नहीं करता। लेकिन अब जब अमेरिका खुद तालिबान से बातचीत कर रहा है और कुछ प्रतिबंध हटा चुका है, तो यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमेरिका ने मिनरल्स के लिए मानवाधिकारों को नजरअंदाज कर दिया है?
ट्रंप और चुनावी समीकरण: बंधकों की रिहाई से क्या होगा असर?
ट्रंप की नजर 2024 के चुनावों पर है और बंधकों की रिहाई एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। यदि वे तालिबान के साथ डील करके अमेरिकी कैदियों को छुड़ाने में सफल होते हैं, तो यह उन्हें चुनावों में फायदा दिला सकता है। इसलिए अमेरिका के कुछ नरम रुख को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
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तालिबान का दावा या हकीकत?
फिलहाल अमेरिकी प्रशासन ने तालिबान के इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। ऐसे में यह साफ नहीं है कि अमेरिका वाकई में तालिबान के साथ किसी डील के करीब है या यह सिर्फ तालिबान का राजनीतिक प्रचार है। लेकिन यह तय है कि दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक स्तर पर बातचीत हो रही है और जमीन पर कुछ बदलाव नजर आ रहे हैं।